Garuda Puran

गरुड़ पुराण

हिन्‍दु धर्म में वेद, पुराण, महाभारत, रामायण आदि के रूप में बहुत सारे धर्मग्रंथ हैं, जिन्‍हें लोग अपनी इच्‍छानुसार जब चाहें तब पढ सकते हैं, अध्‍ययन कर सकते हैं। लेकिन गरुड़ पुराण एक ऐसा पुराण है, जिसे कोई भी हिन्‍दु सामान्‍य परिस्थितयों में नहीं पढता। इस पुराण काे मूलत: किसी व्‍यक्ति की मृत्‍यु के बाद पढा-सुना जाता है अथवा श्राद्ध के समय में पढा-सुना जाता है।

भारतीय संस्कृति और हिन्‍दु धर्म में पुराणों का बहुत गहरा प्रभाव रहा है। ऐसी मान्‍यता है कि पुराणों की रचना स्वयं ब्रह्मा जी ने सृष्टि के प्रथम ग्रन्थ के रूप में की थी और इन पुराणों के माध्‍यम से ही मानवों को उचित व अनुचित का ज्ञान करवाकर धर्म और नीति के अनुसार जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देते हैं। ये मनुष्य के शुभ-अशुभ कर्मों का विश्लेषण कर उन्हें सत्कर्म करने को प्रेरित करते हैं और दुष्कर्म करने से रोकते हैं।

मृत व्यक्ति की आत्मा को शांति और मोक्ष कर प्राप्ति हो सके, इसीलिए गरुड़ पुराण सुनने की परम्‍परा है। ऐसी मान्यता है कि गरुड़ पुराण को सुनने से व्यक्ति की आत्मा को शांति मिलती है क्योंकि धार्मिक मान्‍यता के अनुसार गरुड़ पुराण काे मृतक के घर पर पगड़ी आदि रस्मों के होने तक पढ़ी जाती है और शास्त्रों के अनुसार पगड़ी रस्म तक मरने वाले की आत्मा उसी के घर में निवास करती है और वह भी यह पुराण सुनती है।

लेकिन जब पगडी की रस्‍म हो जाती है, उसके बाद मृतक की आत्‍मा को पूर्ण विश्‍वास हो जाता है कि अब उसके स्‍थान पर परिवार के किसी सदस्‍य को नियुक्‍त कर दिया गया है और अब उसके घर में उसकी कोई जरूरत नहीं है।

वर्तमान समय में जब हम इस पुराण को पढते या सुनते हैं, तो यही लगता है कि इसे कुछ लालची पण्डितों द्वारा लिखा गया है, जो कर्मकाण्डों के माध्‍यम से मृतक के परिजनों से यथासम्‍भव अधिक से अधिक धन, सम्‍पत्ति आदि लूट लेना चाहते हैं, लेकिन इनमें लिखित अनेक प्रकरण ऐसे भी हैं जो उच्च मानवीय मूल्यों को परिभाषित करते हुए बेहतर नैतिक जीवन का पथ-प्रदर्शित करते हैं।

गरुड़ पुराण मूलत: दो हिस्‍सों में विभाजित है जिसके पहले भाग में भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ देव के बीच का संवाद है जबकि दूसरे भाग में मृत्यु के बाद होने वाली घटनाओं व रहस्यों का वर्णन है, जहां जन्म-मृत्यु से जुड़े विभिन्‍न प्रकार के सवाल व उनके जबाब हैं। गरुड़ पुराण में 19 हज़ार श्लोक है और इन सभी श्‍लोकों के माध्‍यम से मूल रूप से यही बात बताई गई है कि व्‍यक्ति द्वारा किए जाने वाले कर्म ही उसकी सद्गति अथवा दुर्गति का कारण होते हैं।

केवल किसी की मृत्‍यु के बाद ही गरुड़ पुराण पढने-सुनने का महात्‍मय नहीं है, बल्कि श्राद्ध पक्ष, जिसे पितृ पक्ष भी कहते हैं, के दौरान अपने पूर्वजों के नाम से तर्पण, दान, श्राद्ध आदि करते समय भी इसे पढने-सुनने का विधान है क्‍योंकि श्राद्ध पक्ष वह समय होता है, जब हिन्‍दु धर्म की मान्‍यतानुसार पितृ लोक से हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं और उस समय यदि गरुड़ पुराण का पाठ किया जाता है, तो उससे हमारे पूर्वजों की आत्‍माओं को शान्ति व मोक्ष प्राप्‍त होता है जबकि यदि पितरों की आत्‍मा को शान्ति व मोक्ष प्राप्‍त नहीं होता, तो उस स्थिति में ये पूर्वज अपने वंशजों को तरह-तरह के कष्‍ट देने लगते हैं और अपने वंशजों की जन्‍म-कुण्‍डली में पितृ दोष के योग के रूप में परिलक्षित होते हैं।

इस पुराण के अनुसार विभिन्‍न प्रकार के पापकर्मों औन उन पापकर्मों के कारण भोगे जाने वाले विभिन्‍न प्रकार के नरकों का वर्णन काफी विस्‍तार से किया गया है, ताकि लोग पुण्‍यकर्म की तरफ ही प्रेरि‍त हों, पापकर्म की तरफ नहीं। इस पुराण में वर्णित विभिन्‍न प्रकार के पापकर्मों से सम्‍बंधित नरकों के नाम निम्‍नानुसार है:

1. अंधतामिस्र नरक
2. रोरवा
3. महारोरवा
4. कुम्‍भीपाक
5. असिपत्र
6. संदंश
7. तप्‍तसूर्मि
8. शाल्‍मली
9. वैतरणी
10. प्राणरोध
11. विशसन
12. लालाभक्ष
13. सारमेयादन
14. अवीचि
15. अय: पान:
16. पंरिमुखम
17. क्षारकर्दम
18. शूलप्रोत
19. कालासूथिरा
20. अवटनिरोधन
21. पर्यावर्तन
22. असितपत्रम
23. सूचीमुख
24. कालसूत्र

जबकि यदि आप हिन्‍दु धर्म की मान्‍यताओं के अनुसार गरुड़ पुराण में वर्णित इन विभिन्‍न प्रकार के पाप कर्म और उनसे सम्‍बंधित विभिन्‍न प्रकार के नरकों के बारे में विस्‍तार से जानना चाहते हैं, तो आपको गरुड़ पुराण जरूर पढना चाहिए।

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